Swayamsidha स्वयंसिद्धा - Hindi Story

Swayamsidha स्वयंसिद्धा – Hindi Story

[ जिम्मेदारी सम्भाली तो ज़बान पर ताले पड़ गए । मन और शब्दों के बीच टूटी बन गई । कहना चाहती थी कि मेरे हिस्से का आरामदे दो , लेकिन… ]

स्वयंसिद्धा

– जयश्री मुलमुले

ज मेरा पचपनवां जन्मदिन है । जीवन के इस पड़ाव में स्वयं को अकेला व असहाय महसय कर रही हैं । हमेशा दूसरों का सहारा बनती आई हूं , आज मुझे सहारे व अपनेपन की सख्त जरूरत महसूस हो रही है । यह ख़ालीपन हर पल खुद बेसहारा होने का अहसास दे जाता है ।

आज कॉलेज जाने का मन नहीं कर रहा है । अकेले में अपने साथ बातें करना अच्छा लग रहा । – है । बेमन से कॉलेज जाने के लिए तैयार तो हो गई थी , ड्रेसिंग टेबल पर रखा हुआ चश्मा पहनते वक़्त आईने पर नजर पड़ी , तो क्षणभर के लिए तो स्वयं को पहचान भी नहीं सकी । चेहरे की झुर्रियां , तनाव , सब दुख – दर्द बयां कर रहे थे । बुढ़ापा दस्तक दे चुका था । दर्पण में वह बचपन का मासूम प्यारा – सा चेहरा दिखने लगा । दौड़कर मां के आंचल में छप जाना , वो स्कूल का पहला कदम । ऐसा लगता है न जाने क्यों उस मासूमियत के साथ बचपन से ही कहीं – न – कहीं एक ऐसी परिपक्वता थी जो हर क़दम पर कठिनाइयों से लड़ने को तैयार थी । छोटी बहन की देखभाल करना न जाने इतने अबोध मन को कैसे आ जाता था । स्कल की पढ़ाई – लिखाई टीचर की डांट – फटकार होमवर्क करना सब काम ख़ुद ही बखूबी निपटा दिया करती थी । मन का संकोची होना , अपनों के रहते हुए भी अपनों से कोसों दूर रखता था । दिल की बात दिल ही में रह जाती थी । आज भी मुझे वो ड्रॉइंग कॉम्पीटिशन का प्रथम पुरस्कार याद आता है । मैं बहुत खुश थी , शाम को दफ़्तर से पापा के आने का इंतजार कर रही थी कि पापा को मैं यह खशखबरी खद ही सनाऊंगी , वे बहत खुश होंगे । वो क्षण आया भी मगर बात बनी नहीं , दिल की बात जुबां पर आई ही नहीं । वो कौन – सा डर या संकोच था , क्या नाम दूं कुछ समझ नहीं आता , हमेशा दिल की बात कहने से मन घबरा जाता था ।

कॉलेज के दिन आए और चले गए । अपनी मेहनत व लगन से पढ़ाई में हमेशा अव्वल रही । फिर चला नौकरी का सिलसिला जो जवानी के पहले पड़ाव पर शुरू हुआ और अपनी तीव्र गति से अनवरत चलता जा रहा है । पहले छोटी नौकरियां फिर अब ये कॉलेज का प्राध्यापक पद । जीवन के संघर्ष व उतार – चढ़ाव में हमेशा अकेली खड़ी रही । कभी आंखों से आंसू झलके , तो वो भी अकेले में । काश , मैं अपने ग़मों को अपनों के साथ बांट पाती , मन का बोझ तो कम होता ही ।

मेरी नौकरी से घर की हालत में सुधार आया , तो सब बहुत खुश थे । सभी सुख – सुविधाएं उपलब्ध थीं । मां – पिताजी , बहन – भाई की जरूरतों को पूर्ण करना मेरे जीवन का लक्ष्य बन गया । जीवन में भौतिक सुख – सुविधाएं तो आती – जाती रहीं , मगर इस बीच मन में एक ख़ालीपन घर करने लगा । शादी का समय आया , वह सुख मिला भी , मगर संघर्षों के साथ । फिर भी दिल में एक खुशी की लहर जाग उठी कि अब इस खोखले समाज में बनावटी जिंदगी नहीं जीनी पड़ेगी । अब घर बैठकर अपना व परिवार का ख्याल रखंगी , मगर तकदीर को शायद यह मंजूर नहीं था ।

मेरा बचपन से ही एक सपना था कि मुझे अपने जीवन में पुरुष की छत्रछाया मिले जिसके साथ मुझे कोई भी दुख व संकट न झेलने पड़ें । बचपन में पिताजी का साथ , जवानी में भैया का सहारा व प्यार मेरे नसीब में शामिल नहीं था शायद । ऐसा नहीं कि वे मेरी जिंदगी में शामिल नहीं थे , मगर वो दूरी न जाने क्यों बरकरार थी । सहारे जैसा आसरा नहीं था । मैं जिम्मेदारियां लेती गई और केवल ‘ जिम्मेदार ‘ बन कर रह गई । उन अधूरे सपनों की पूर्ति अपने जीवनसाथी में ढूंढने का प्रयास करती रही , मगर पारिवारिक कलह , परेशानियों ने उन्हें भी पूर्ण नहीं होने दिया । मेरे वेतन के सहारे की जरूरत । बनी रही और मैं सुकून से बैठकर घर – गृहस्थी सम्भालने का सपना ही देखती रह गई । अब आस सिर्फ बेटे पर टिकी हुई है । बचपन से लेकर बुढ़ापे तक का सफर यूं ही निकल गया । अब जिंदगी के आखरी पड़ाव पर शायद यह आस पूर्ण हो जाए । परन्तु अब मन बहत कठोर हो गया है । इसके लिए । सुख – दुख कोई मायने नहीं रखता शायद ।

अचानक दर्पण में धुंधलापन छा गया , चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है , बहते आंसुओं का । पछिकर पुनः ऐनक आंख पर चढ़ाई तो कुछ धुंधलाहट कम हई । चेहरे पर बनावटी हंसी बिखरत हुए । में अपने गंतव्य पर चल पड़ी । जीवन के इस आखरी पड़ाव को , मैं अकेले ही पार करना चाहता । ‘ स्वयंसिद्धा ‘ जो हूं ।

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