Pahla Puraskar Hindi Story - SLAYpoint

Pahla Puraskar पहला पुरस्कार – Hindi Story

[ भाषण प्रतियोगिता में भाई साहब ने मेरा नाम लिखवा दिया था। मैंने अच्छी तैयारी भी कर ली थी पर मंच पर जाकर ऐसा कुछ होगा सोचा नहीं था। ]

पहला पुरस्कार

– शंकरलाल केशरवाणी

बात बहुत पुरानी है, क़रीब 80 साल पहले की। मैं छत्तीसगढ़ के मुंगेली में कक्षा तीसरी या चौथी में पढ़ता था। तब वहां एक सार्वजनिक पुस्तकालय हुआ करता था, जहां प्रतिवर्ष गणपति की स्थापना होती और पूरे गणेश पक्ष में कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते। इसी के तहत एक दिन प्रायमरी स्कूलों के छोटे बच्चों के लिए भाषण प्रतियोगिता का आयोजन होना था। मेरे बड़े भाई ने मेरा भी नाम लिखवा दिया और एक भाषण लिखकर रटने के लिए मुझे थमा दिया। मैंने भी अपनी समझ के हिसाब से अच्छी तैयारी कर ली।

बहरहाल, प्रतियोगिता आरम्भ हुई। मेरा नाम पुकारा गया। मैं बोलने के लिए मंच पर खड़ा हुआ, तो सामने बैठे श्रोताओं को देखकर ही मेरा आत्मविश्वास लड़खड़ा गया। खैर, मैंने तैयारी के अनुसार बोलना शुरू किया – ‘श्रीमान सभापति महादेव (हड़बड़ाहट में मुंह से महोदय की जगह महादेव निकल गया था)!’ लोग हंस पड़े। अब तो हालत और खराब हो गई, आगे कुछ सूझा ही नहीं, रट्टा मारा हुआ सब भूल गया। इस बीच मैं स्तब्ध खड़ा रहा। बच्चे चिल्लाने लगे – ‘बैठ जा, बैठ जा।’ मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। अंततः किसी तरह साहस जुटाकर यही बोल सका – ‘इतना कहकर मैं आपका स्थान ग्रहण करता हूं।’ एक बार फिर गलती। देखा तो बहुत-से लोग हंस रहे थे।

चूंकि कार्यक्रम में अंत तक रहना ही था, इसलिए सिर झुकाए बैठा रहा। वहां क्या चल रहा है, मेरे बाद किसने भाषण दिया, क्या कहा, कुछ ध्यान नहीं रहा। आखिरकार परिणाम और पुरस्कार वितरण की बारी आई। तृतीय पुरस्कार के लिए मेरा नाम पुकारा गया। लोग तालियां बजा रहे थे और हंस भी रहे थे। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो मझे ही हो रहा था। मैं तो कुछ बोल ही नहीं सका था, फिर पुरस्कार कैसे? वह तो बाद में भाई साहब ने बताया ‘बोलने वाले कुल तीन ही थे और पुरस्कार भी तीन को दिए जाने थे, अतएव तुम्हारा तीसरा नंबर लग गया।’ वाह री किस्मत। बाद में कई पुरस्कार मिले, पुरस्कार वितरण के मौके भी मिले, परंतु जीवन का यह पहला ईनाम हमेशा याद रहता है।

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