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Motivational Guru मोटिवेशनल गुरु – Hindi Story

[ गुरु जी के प्रवचन छोड़ने का अफसोस मना रही थी कि सचमुच के मोटिवेशनल गुरु से मुलाक़ात हो गई, जिनके सारे सवक़ तजुओं से लबरेज़ थे। ]

मोटिवेशनल गुरु

– संगीता माथुर

सी ए अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों के स्वागत में खुले होटल के विशालकाय गेट, लताओं के झुरमुट, बाहर कम्पाउंड में ही नाश्ते खाने के लिए सजी टेबलें… मंत्रमुग्ध निगाहों से मैं संपूर्ण पेनोरमा का भरपेट अवलोकन भी नहीं कर पाई थी कि काव्या मेरा हाथ पकड़कर लगभग घसीटते हुए होटल के अंदर प्रविष्ट हो गई।’

‘कुछ खा पी लेते न? तू तो सिर्फ दध पीकर निकली है घर से।’ ‘मुझे भूख नहीं है। वैसे भी अंदर जी डी के लिए लाइन लगनी शुरू हो गई है।’

‘कैंपस प्लेसमेंट ने तो बेचारी की भूख प्यास ही हर ली है’ सोचते हुए मैं हॉल के बीच में पहुंची तब तक बेटी लाइन में घुस चुकी थी। कमरे का दरवाजा बंद हुआ तब मुझे होश आया, ‘हाय रब्बा, बेस्ट ऑफ लक कहना तो रह ही गया।’ काव्या ठीक ही साथ आने के लिए मना कर रही थी ‘आप वहां बैठे – बैठे करोगे क्या?’

‘घर पर मेरा मन नहीं लगेगा। वहां रहूंगी, तो तसल्ली रहेगी’ कहने को तो कह गई थी, किंतु मन में एक बार फिर अपने प्रिय मोटीवेशनल गुरू त्यागीजी के प्रवचन मिस कर जाने की टीस-सी उठी थी। अपनी कॉलोनी में उनका प्रवचन रखवाने में सबसे आगे मैं ही थी। तब कहां पता था कि उसी दिन काव्या का भी कैंपस प्लेसमेंट निकल आएगा। बच्चों की पढ़ाई और करियर को हमेशा प्राथमिकता देने वाली एक कर्तव्यनिष्ठ मां होने के नाते मैंने बमुश्किल अपने मन को समझा लिया था कि ऐसे अवसर पर मेरा काव्या के साथ होना ज्यादा जरूरी है, पर यहां आकर उस कर्तव्यनिष्ठ मां को क्या हो गया है? कभी फ्री के नाश्ते के लिए ललचा रही है, कभी विश करना भूल रही है।

मोबाइल बजने पर मेरी चेतना लौटी। बच्चियों के पापा का फोन था, ‘हां, हम वक्त से पहुंच गए थे। काव्या विप्रो के जी डी में घुस गई है। अभिभावक तो कम ही हैं। ज्यादा भीड़ तो बच्चों की ही है , नाम्या के टाइम जितनी ही है, आप आज ऑफिस कैंटीन में खा लेना।’

एक आदमी को ‘डेलॉइट डेलॉइट’ आवाजें लगाते देख मैं उधर पहुंच गई। उसके चारों ओर डिग्रियां लहराते बच्चों का सिटी बस टाइप मजमा जमा था। कुछ लोग इस सब की तस्वीरें भी उतार रहे थे। ‘बेटा, यह डेल तो नहीं है न? ‘मैंने भीड़ में अपने आगे खड़े लड़के से पूछा, क्योंकि काव्या का डेल में भी पी आई था। ग्रुप डिस्कशन, पर्सनल इंटरव्यू जैसे कुछ शब्द सीख लेने के बावजूद मुझे खुद पर संशय ही था। भीड़ कुछ छंटने लगी तो मैंने बैठने की तलाश में इधर-उधर नजरें दौड़ाई। दर कोने में फांउटेन के पास एक गोल टेबल के इर्द-गिर्द दस-बारह ख़ाली कुर्सियां नजर आईं। वहां जाकर बैठूंगी तो काव्या कब निकलेगी पता ही नहीं लगेगा। वह बेचारी मुझे खोजती रहेगीे।

दूर कोने में रखी कुर्सी मैं खींचकर हॉल में ले आई और एक दीवार से सटाकर बैठ गई। यहां से मैं काव्या के बंद दरवाजे पर नजर रख सकती थी। ‘काव्या आएगी तो एक कुर्सी उसके लिए भी चाहिए होगी’ सोचकर मैं एक कुर्सी और उठा लाई और उस पर अपना बैग रख दिया। बैग से बॉटल निकालकर पानी के कुछ बूंट गले के नीचे उतार ही रही थी कि मैंने गौर किया एक और महिला मेरा अनुसरण करते हए वहां से कुर्सी खींचकर मुझसे कुछ दूरी पर बैठने का उपक्रम कर रही थी। ‘मेरी हमउम्र या थोड़ी बड़ी होगी। खैर, मुझे क्या?’ मैं अपना मोबाइल निकालकर वॉट्सएप, फेसबुक की आभासी दुनिया में खोने ही वाली थी कि ‘ममा, ममा’ की पुकार मुझे फिर से यथार्थ दुनिया में घसीट लाई।

‘मेरा जी डी क्लीयर हो गया है । पी आई के लिए ऊपर जा रही हूं,’ तेजी से मेरे कंधे झिंझोड़कर काव्या लिफ्ट की ओर बढ़ गई थी। ‘मैं भी आती हूं’ बैग संभालती मैं उसके पीछे-पीछे लपकी, तब तक वह लिफ्ट में चढ़ चुकी थी। ‘पेरेन्ट्स ऊपर अलाउड नहीं हैं लिफ्टमैन ने मुझे रोक दिया था। काव्या ने सुना या नहीं पर मैंने चिल्लाकर बेस्ट ऑफ लक बोल दिया और अपनी सीट पर लौट आई।

‘बधाई हो‌’ उन महिला जिनका नाम मृदुलाजी था, ने मुझे बधाई दी। मन ही मन खुश होते हुए भी मैंने ऊपर से कहा ‘अभी तो 800 बच्चों के जी डी में से सलेक्ट हुई है। पर्सनल इंटरव्यू तो अभी बाकी है। सच, बहुत प्रेशर है बच्चों पर।’

‘जिंदगी के प्रेशर आपका बेहतरीन बाहर लाएंगे। यूं ही नहीं मिलती राही को मंजिल, एक जुनून-सा दिल में जगाना होता है। पूछा चिड़िया से कैसे बना घोंसला, बोली भरनी पड़ती है उड़ान और तिनका-तिनका उठाना पड़ता है।’ मुझे लगा साक्षात त्यागीजी ही मेरे सामने आ विराजे हैं। उत्सुकतावश और कुछ सुनने के इरादे से मैंने कुर्सी उनके समीप खिसका ली। तभी एक लड़की कुछ खोजती-सी हमारी कुर्सियों के पास आकर रुक गई।

‘यहां भी नहीं है। कहीं चार्जिग पांइट ही नहीं मिल रहा।’ हमारी आंखों में प्रश्नचिन्ह देख वह बोली, रात में मोबाइल चार्जिंग में डालना भूल गई। सवेरे जल्दी-जल्दी यहां आकर बैटरी देखी तो जीरो। आने के बाद से एक बार भी पापा-मम्मी से बात नहीं हो पाई है। चिंता के मारे उनका बुरा हाल हो रहा होगा।’

मृदुलाजी का हाथ फुर्ती से अपने बैग में घुसा और अगले ही पल उनके हाथ में था-पावरबैंक। लड़की की आंखें चमक उठीं। ‘ओह बैंक्यू आंटी! तैंक्यू सो मच!’ लड़की अपना मोबाइल चार्जिंग में लगा वहीं कुर्सी पर बैठ फोन पर बतियाने लगी।

‘…इंटरव्यू तो अच्छा ही गया था। सब बता तो रही थी। दोनों काफ़ी प्रभावित भी लग रहे थे। लेकिन अंत में बोल दिया नॉट सलेक्टेड! अरे भई नहीं लेना था तो पहले ही बता देते, अब तो दूसरे इंटरव्यू में जाने का मूड ही नहीं रह गया है। भूख नहीं है, हां दे दूंगी। देना ही पडेगा। अब फोन रखती हूं। बैटरी नहीं है। ‘इधर फोन बंद हआ, उधर मृदुलाजी के बैग (मन ही मन मैंने उसे भानुमति का पिटारा नाम दे दिया था) से मठरी और बिस्किट निकल आए।’ खा लो, संकोच नहीं करो… थोड़ा जूस लोगी?’ उन्होंने पिटारे में से जूस का पैक निकाला।

‘नहीं नहीं आंटी! बस यह बहुत है उसने खाना शुरू कर दिया था।’ सवेरे जल्दी बिना कुछ खाए ही निकल गई थी मैं। आर्टिकलशिप के लिए तीन सालों से यहीं कमरा लेकर रह रही हूं। नाश्ता तो लगा था पर जी डी में जल्दी नंबर लगवाने के चक्कर में बिना खाए ही अंदर घुस गई फिर ऊपर इंटरव्यू के लिए चली गई। आगे तो आपने सुन ही लिया होगा।’

‘बेटी, उन्हें दोष देना ग़लत है। बताओ यदि वे आरंभ में ही तुम्हें नकार देते, तुम पर हावी हो जाते तो क्या तम परा इंटरव्यू दे पातीं? नहीं न? तुम्हारा इंटरव्यू निश्चित रूप से अच्छा गया होगा लेकिन संभव है औरों का तुमसे भी अच्छा गया हो। तुमने सारे जवाब सही दिए हों पर किसी ने तुमसे ज्यादा आत्मविश्वास से, ज्यादा विस्तार से, ज्यादा परिष्कृत भाषा में जवाब दिए हों तो वे तो उसका ही चयन करेंगे न? केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं होता। उसका उम्दा प्रस्ततीकरण भी मायने रखता है। जो नहीं हो पाया उसके लिए हताश होने की बजाय, उससे सबक लेकर अगला इंटरव्यू दो। जो अपने कदमों की काबिलियत पर विश्वास रखते हैं न, वे ही मंजिल पर पहंचते हैं।’ लड़की के चेहरे पर उभरती आशा की चमक बता रही थी कि निराशा के बादल छंटने लगे हैं।

‘चलती हूं आंटी, काफ़ी चार्ज हो गया।”कौन? तुम या मोबाइल?”दोनों’ लड़की सहजता से हंसकर लिफ्ट की ओर बढ़ गई। इस बार मृदुलाजी के संग मैं भी उसे बेस्ट ऑफ लक कहने से नहीं चूकी। मैं उनसे काफी प्रभावित हो चली थी।

‘लंच लगना शुरू हो गया है। कर आते हैं।’ मैंने प्रस्ताव रखा। ‘आप कर आइए। मैं पोते का इंतजार कर रही हूं। अभी तक न नीचे आया है, न कोई मैसेज है’ उन्होंने मोबाइल देखते हुए कहा।

‘पोता? इतनी उमर नहीं लगती आपकी।”हा हा! योगा का कमाल है। बेटे बहू को तो उसने साथ आने से साफ़ इंकार कर दिया। पर मुझसे बहुत जुड़ाव है। मुझे मना नहीं कर पाया। मैंने कह दिया था मैं तो अपने चेंज के लिए साथ जा रही हूं। लो आ गया! शैतान को याद किया और शैतान हाजिर।’

‘दो राउंड तो हो गए हैं। तीसरा लंच के बाद होगा’ पोते यश ने आते ही दादी के बैग से जूस निकालकर पीना आरंभ कर दिया। ‘चल, लंच कर लेते हैं।’

‘मझसे नहीं खाया जाएगा। आप खा लो। मैं तो आपको देखने आया था वह चलने को उद्यत हुआ तो दादी ने फूर्ती से पिटारे से मुट्ठा भर बादाम निकालकर उसकी जेब में सरका दिए। ‘ये जरूर से खा लियो। ऑल द बेस्ट!’ ‘बच्चे ऊपर से भले ही कुछ भी कहें, हमारे आने से उनका मनोबल तो बढता ही है । ‘ मृदुलाजी पोते के अपनत्व से भावुक थीं। मैंने सहमति में गर्दन हिलाई।

लंच के दौरान हमें एक-दूसरे को और जानने का मौका मिला। ‘चार साल पहले जब मैं बड़ी बेटी के कैंपस प्लेसमेंट में आई थी तब भी ऐसा ही अफरा-तफरी का माहौल था। कोई गाइड करने वाला नहीं था। तब तो हमें पूरा खाना भी नसीब नहीं हुआ था। कोई व्यवस्था ही नहीं थी। खाना समाप्त करने तक मेरा असंतोष शब्दों में निकलता रहा। अंत में दो तरह की पेस्ट्री खाते हुए मैंने खाने की तारीफ की। ‘बहुत बढ़िया खाना था।’

मृदुलाजी मुस्करा दीं। ‘चलो, कुछ तो पसंद आया तुम्हें! अब जरा अपना दृष्टिकोण सकारात्मक करके तुलना करो। करो, कोशिश करो!’

‘अं . . . हां! अभ्यर्थियों में लड़कियों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई है, जो एक शुभ संकेत है। खाने-पीने की व्यवस्था निःसंदेह पहले से बहुत उम्दा है। इस बार पेरेन्ट्स को ऊपर जाने की मनाही है जिससे ऊपर सब निश्चित ही व्यवस्थित होगा।’

हुँ, यह हुई न बात! नजरिया बदलने से आधी से ज्यादा समस्या स्वतः ही सुलझ जाती है। एक संपूर्ण स्वस्थ शरीर को नजरअंदाज करते हुए मक्खी हमेशा घाव पर ही जाकर बैठेगी क्योंकि खामियां ढूंढना उसका स्वभाव है।’

मैं पुनः प्रभावित थी। हम लौटकर बैठे ही थे कि उनका पोता यश आ गया। उसने हम दोनों के पांव छुए। उसका अच्छे पैकेज पर चयन हो गया था। अभी में उसे बधाई दे ही रही थी कि काव्या भी आ गई। अंतिम राउंड में बाहर हो जाने के कारण वह बेहद निराश थी। मेरा चेहरा भी लटक गया और दूसरी वाली कंपनी का क्या हुआ?

‘उसका तो पहला राउंड भी क्लीयर नहीं हो पाया।’ रूंआसी काव्या के आंसू टपकने ही वाले थे कि मैंने उसे सीने से लगा लिया। ‘कोई बात नहीं! हम ऑफ कैंपस ट्राय करेंगे। कंपनियों के पोर्टल्स पर सीधे अप्लाई करेगें। नाम्या भी कुछ जगह रेफर करवा देगी। तूने ही तो बताया था कि सी ए उत्तीर्ण करने वाले 75 – 80 प्रतिशत बच्चों को जॉब मिल ही जाता है, फिर तूने तो प्रथम प्रयास में परीक्षा उत्तीर्ण की है।

‘बिल्कुल में तो खुद कुछ ऑफ कैंपस इंटरव्यू भी दूंगा। फिर उनमें से बेस्ट ऑप्शन चुनकर जॉइन करूंगा। यह देखो इन जॉब साइट्स, लिंक्डइन पर मैंने अपना रेज्यूमे लगा रखा है।’ यशं मोबाइल पर काव्या को बताने लगा तो वह भी गौर से समझने लगी। उसके चेहरे पर पसरती उम्मीद की किरण से मुझे अद्भत संतुष्टि का अहसास हो रहा था। तभी मैंने देखा मृदुलाजी प्रशंसात्मक निगाहों से मझे ही ताक रही थीं। अपनी मोटिवेशनल गुरु के सम्मुख कृतज्ञतावश मेरे कर स्वतः ही जुड़ गए, जिन्हें उन्होंने आगे बढ़कर मजबूती से थाम लिया।

Story’s Moral [ सिख ] –

असफलता से हमें निराश नहीं होना चाहिए तथा हमें निरंतर प्रयास करना चाहिए।

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