Marichika मरीचिका - Hindi Story

Marichika मरीचिका – Hindi Story

[ गुंजन की ओर खिचता चला आ रहा था हर्षित। उसका मन काम और शौक में रमा था। पर हर्षित को मन से दूर भी नहीं कर पा रही थी। और अब? अब तो उसका मन और भी पक्का हो चुका था, लेकिन कुछ और, इरादों के साथ। ]

मरीचिका

– ज्योति जैन

ज उनका ऊपरी हिस्सा नीले फूलों से आच्छादित लग रहा था। वो एकदम से चौकी – ‘अरे, इतने हेर फल? कब आ गए, वो भी इस कलर के?’ अगले ही पल उसने ध्यान से देखा तो हंस पड़ी। ‘क्या सबसरत मरीचिका है। अरे, मैं भी क्या सोच रही हूं मरीचिका तो होती ही खबसूरत है। तभी तो भगवान राम-सीता भी धोखा खा गए थे। दरअसल, वो एक बड़े स्क्रीन का रिफ्लेक्शन शीशे से होकर सामने पेड़ों पर पड़ रहा था। जिस फ्लोर पर गुंजन संगीत क्लास लेती थी। उसके नीचे वाले फ्लोर में किसी के विज्ञापन का बड़ा स्क्रीन लगा था। उस समय शायद वो स्क्रीन प्लेन नीला था और उसी का प्रतिबिम्ब बिल्डिंग में लगे शीशों की दीवारों के कारण पेड़ पर कुछ इस तरह पड़ रहा था, मानो पूरा पेड़ नीले फूलों से लदा हो । प्रकृति प्रेमी गुंजन ये देखकर खुश हो गई थी। लेकिन वो तो मरीचिका ही थी।

गुंजन 26-27 वर्षीय स्वाभिमानी व आत्मनिर्भर यवती थी। जो अपनी जॉब के अलावा सुबह-सुबह। संगीत क्लास लेती थी। संगीत के अलावा उसका एक अन्य शौक ट्रैकिंग था। जब भी मौका मिलता, वो अपने एक ग्रुप के साथ ट्रैकिंग को निकल पड़ती थी।

कल शनिवार है, सारी बात कल तय करनी है, परसों रविवार को ग्रुप ट्रैकिंग के लिए जा रहा है, सोचते हुए गुंजन सीढ़ियों से उतरने लगी। तभी बलजिन्दर की बांसुरी की धुन बजी-ये उसके मोबाइल की रिंगटोन थी। बैग से मोबाइल निकालकर देखा तो हर्षित का कॉल था। उसने जैसे ही उठाया ‘हल्लो’ उधर से हर्षित का खनकता स्वर था।

‘हां, बोलो’ गुंजन ने पूछा।’अरे क्या यार, इतना रूखा-सूखा हलो?”अरे नहीं, रूखा-सूखा नहीं, बोलो?’ उसने धीरे से हंसकर कहा।’संडे को ट्रैकिंग पर जा रही हो ना?”हां ऑफकोर्स!”गुड-गुड, मैं भी चल रहा हूं। सच में यार, तुम्हारे साथ ट्रैकिंग में मजा आता है….’साथ की क्या बात है, ट्रैकिंग में तो वैसे भी मजा आता है।”तो मेरे होने न होने से तुम्हें कई फ़र्क नहीं पड़ता?’ बनावटी क्रोध से हर्षित ने पछा।गुंजन हंस पड़ी – ‘वाकई नहीं पड़ता। मेरा पैशन है ट्रैकिंग। मुझे कठिनाइयों को जीतना अच्छा लगता। बल्कि मुझे लगता है बाधाएं तो हमारे जीवन को मजबूती प्रदान करती हैं।”यार तुम्हारे ना…. दो बड़े विपरीत शौक हैं – म्यूजिक और ट्रैकिंग, कहां दोनों का मेल है?”अरे क्यों नहीं मेल है भई? संगीत तो मुझे प्रकृति के करीब ले जाता है और ट्रैकिंग भी। मुझे तो दोनों ही बराबर पसंद हैं।”और मै?’ हर्षित ने एकदम से सवाल दाग दिया।’

‘तुम…. अच्छे हो’ कुछ अचकचा कर गुंजन धीरे से हंस दी और ‘बाय’ कहकर फोन बंद कर दिया। पिछले कुछ दिनों से वो महसूस कर रही थी कि हर्षित उसकी ओर आकर्षित है…. और वो स्वयं शायद वो भी उसे पसंद करती थी। पर…. अभी…. इतनी जल्दी…. और उसने विचारों को झटक दिया। लेकिन वो बड़ा ही ढीठ था। बार-बार विचारों में आ रहा था। खैर, रविवार की ट्रैकिंग बहुत ही शानदार रही और उसे वाकई हर्षित के साथ मज्जा आया। हर्षित ने कई बार घुमा-फिरा कर उससे अपने उस रिश्ते के लिए पूछा जिसके लिए वो वास्तव में अभी तैयार नहीं थी। जाहिर है उसे टालना मुश्किल लग रहा था। लौटते वक्त उसने गुंजन को अगले रविवार अपने एक दोस्त के फार्म हाऊस पर चलने आग्रह किया। उसका कहना था कि वो शहर से दूर भी है और उसके आसपास के पहाड़ी एरिया में हम ट्रैकिंग का आनंद भी ले पाएंगे। हालांकि वो उसे एकदम से मना नहीं कर पाई और देखते हैं कहकर उस वक्त तो पीछा छुड़ाया। पर कभी-कभी उसे हर्षित का अधिकार जताना शायद अच्छा लगता था वो था भी आकर्षक व्यक्तित्व का धनी। सभ्य व सुसंस्कृत था। परिहास करता भी था तो शालीनता से ‘कुल मिलाकर कोई देखे तो प्रभावित हुए न रह सके। एक आम आधुनिक युवती शायद अपने लिए वैसा ही जीवनसाथी चाहेगी। बिल्कुल खानदानी या यूं कहें कि सर्वगुण सम्पन्न।

दरअसल, हर्षित से गुंजन की मुलाकात एक ट्रैकिंग के दौरान ही हई थी। दोस्तों के जरिए उसकी दोस्ती हर्षित से हुई थी। वैसे वह उसे अच्छा लगता था, पर वह उसके बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानती थी। और वैसे जानना चाहती भी नहीं थी। फिलहाल उसका सारा ध्यान अपने करियर पर ही था। बचा हुआ समय वह अपने शौक को देना चाहती थी। जिस परिवेश से गुंजन आती थी व जिस काल में भी, वहां लड़कों से दोस्ती आम थी और दोस्ती से आगे वह अभी बढ़ना नहीं चाहती थी, जो उसकी उम्र की कई लड़कियां बढ़ जाती थीं।

सोमवार से फिर उसका वही रुटीन शुरू हो गया था। सुबह क्लास फिर ऑफिस और शाम को परिवार या दोस्तों के साथ। ऑफिस में रूमीना उसकी कलीग व अच्छी दोस्त थी। आज जैसे ही ऑफिस पहुंची लिफ्ट से निकलते ही सामने रूमीना मिल गई। ‘हाई…. गुड मॉर्निंग’ गुंजन ने चहकते हुए कहा। पर वह तब हैरान रह गई जब रूमीना ने जवाब चहकते हए नहीं दिया। ठंडा- सा ‘हाय’ कहकर उसने गुंजन से धीरे से पूछा – ‘ गुंजन, क्या तुम लंच के वक्त मेरे साथ चलोगी? अकेले तुमसे जरूरी बात करनी है!’

‘हां, हां, क्यों नहीं!’ उसका मूड भांपते हुए गुंजन ने भी संजीदा होकर कहा। और दोनों अपने अपने काम में लग गई थीं। पर पूरे समय गुंजन महसूस करती रही कि रूमीना कछ परेशानी में है। अब उसका मन भी काम में नहीं लग रहा था। जैसे-तैसे लंच टाइम हुआ और दोनों कैंटीन में न जाकर अन्य फ्लोर पर स्थित रेस्त्रां में चली गई।

‘हां बता यार, क्या हुआ, वॉट इज द प्रॉब्लम?’ गुंजन उतावली थी।’वो’रूमीना मानी कहने के लिए साहस जुटा रही थी। ‘दरअसल, मैंने फेसबुक पर तुम्हारी कल कीट्रैकिंग की पिक्स देखीं, जो तुमने कल डाली थीं।’

‘हो तो?’ गुंजन चकित थी। ‘तो क्या हुआ….?”तो वो….फोटो में….तेरे साथ जो लड़का आई मीन हर्षित।’ हां तो गुंजन असमंजस में थी। हर्षित क्या? एंड यू नो हिम? कैसे?’

‘यार वो हर्षित’ कहते-कहते उसका स्वर भराया और आंखें लबालब हो पीड़ा गालों पर बह निकली।”क्या हुआ’ गुंजन अब परेशान थी। थोड़ा संयत होकर रूमीना ने गुंजन को जो बताया तो वो जैसे वो आसमान से गिरी। रूमीना ने बताया किसी फ्रेन्ड के जरिए उसकी हर्षित से दोस्ती हई थी। धीरे-धीरे वो नों एक दसरे को चाहने लगे। हर्षित था ही ऐसा। बातें ऐसी लच्छेदार…. ये तो गुंजन भी महसूस कर चुकी थी। कहीं न कहीं उस भी एक साॅफ्ट काॅर्नर हर्षित के लिए महसूस हआ था। फिर रूमीना ने बताया कि कैसे रिश्ता बढ़ता-बढ़ता उसके दोस्त के फार्म हाउस तक चला गया। पेरेन्टस से दूर जॉब कर रही रूमीना उन नाजुक पलों में बहक गई और तब हर्षित ने अपना असली रूप दिखाया। जो सभ्य, शालीन, ससंस्कारित वह लगता था, असल में वो वैसा नहीं था। रूमीना उसकी ब्लू मरीचिका में फंस चकी थी।

ओहऽऽऽ पिछले कुछ दिनों से गुंजन महसूस तो कर रही थी कि रूमीना खिली-खिली नहीं रहती पर इसे उसने काम का प्रेशर व होम सिकनेस समझ लिया था। एक-दो बार उसने पूछा भी था पर रूमीना ‘कुछ नहीं यार’ कहकर धीमे से मुस्करा दी थी। पर कल जब उसने गुंजन की ट्रैकिंग की फोटो देखीं जो उसने फेसबुक पर डाली थी, तो एक 5-7 जनों के ग्रुप फोटो में हर्षित भी था। अब तक लोक लाज के भय से ब्लैकमेल हो रही रूमीना को लगा ऐसा न हो कि गुंजन भी उसका शिकार हो जाए, इसलिए उसने तय किया था कि आज वो गुंजन से बात करेगी। और सारी बात कहते-कहते हर्षित की ब्लैकमेलिंग की कालिख रूमीना की आंखों से भर-भर कर बह निकली। अपने साथ हुए इस हादसे को उसने सिलसिलेवार गुंजन को बताया और बताया कि कैसे वह शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से भी टूट चुकी थी। हर्षित भले ही सम्पन्न वर्ग से था मगर इस तरह की फितरत वाले को तो जितना पैसा हो, कम ही पड़ता है। हे भगवान, अब वो समझी। उसने बॉस को भी काम में परफेक्शन न आने की वजह से रूमीना पर बिगड़ते देखा था। बेचारी रूमीना।’

‘ओ माई गॉड’, गुंजन हैरान थी व उसे स्वयं पर क्रोध भी आया। बड़ी सयानी समझती थी खुद को। बेवकूफ कहीं की? कैसे भांप नहीं पाई? पर, फिर उसे समझ में आ चुका था कि हर्षित है ही इतना शातिर। कैसा दिखता है और चरित्र देखो । लम्पट कहीं का…. पर क्या मजाल जो किसी को भनक भी लग जाए। इतना शातिर कैरेक्टर था। और ये कैरेक्टर भी किसी लुभावनी मरीचिका से कम नहीं था। असल में राक्षस, लेकिन ऊपर से मासूम व भोला हिरण। पहले तो उसे रूमीना पर भी क्रोध आया लेकिन फिर सोचने लगी मरीचिका तो भ्रमित करती ही है। रूमीना तो बेचारी बिलकुल अनजान थी। पर अब जो भी हो वो उसे इस सबसे बाहर निकालकर ही दम लेगी।

और अब बस। उसने रूमीना को हिम्मत बंधाई। ‘पहले खाना ऑर्डर करते हैं, खाना खाते हैं डटकर। और यकीन मान, मैं तुझे इस ब्लू मरीचिका से बाहर निकाल कर रहूंगी। साइबर अपराधों को रोकने के लिए जो टीम है, उसके एक प्रमुख मिस्टर कपूर हमारे ट्रैकिंग हेड के फास्ट फ्रेन्ड हैं। हम उनसे मिलेंगे। तू चिंता मत कर सब ठीक होगा। अभी तक वो सबको लुभाकर अपना शिकार बना रहा था, अब उसका पाला एक खूबसूरत मरीचिका से पड़ने वाला है…. ‘कहते-कहते उसने अपने दोनों हाथों की तर्जनी व अंगूठे से अपनी कॉलर को स्टाइल से ऊपर किया और कुटिलता से मुस्कुरा दी।

Story’s Moral [ सिख ] –

हमें किसी भी व्यक्ति पर जल्द ही भरोसा नहीं करना चाहिए।

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