Kaath Ki Gudiya Hindi Story

Kaath Ki Gudiya काठ की गुड़िया – Hindi Story

[ आखिर अपने ही घर में क्यों पराई हो गई थी भाभो…? क्या था वो कुसूर , जिसकी सजा वह सहती रही । ]

काठ की गुड़िया

– रीना मेनारिया

भाभो ऐ भाभो ! तुम मेरी भाभो हो ?’ अनगिनत झुर्रियों वाले उस हाथ पर नीली स्याही से गदे ‘भाभो’ शब्द को देखकर मैं उस बूढ़ी औरत को झंझोड़ने लगी । उसने मेरी ओर देखा । सिर से पांव तक देखकर पोपले मुंह से मुस्कराई । फिर ना में गर्दन हिला दी ।

‘मतलब तुम मेरी भाभो नहीं हो ?’ उसने फिर गर्दन हिला दी ।

‘तुम झूठ बोल रही हो ।’ मैं थोड़ा ऊंचे स्वर में बोली तो पास बैठी एक अन्य महिला तपाक से बोल उठी – ‘अरे सेठानी इसका नाम बसंती है । यह कोई भाभो – वाभो नहीं है ।’ वह हंसी ।

भाभो शब्द को मैंने फिर गौर से देखा और उस हाथ को सहलाते हुए कहा – ‘देखो याद करो । मेरे कहने पर ही तुमने मेले में यह नाम गुदवाया था । मेरी मां ने भी मेरे बाबा का नाम लिखवाया लेकिन तम ना नकर कर रही थीं । तुम्हें कर…कर…बज रही उस मशीन से डर लग रहा था , पर मेरी ज़िद पर तमने अपनी कलाई पर ‘भाभो’ लिखवा ही लिया । याद करो भाभो ।’ कहते हुए मेरी आंखें भीग गई । मेरी आंखों में आंसू देख भाभो पिघल कर पानी हो गई ।

बोल पड़ी – ‘तू इतनी बड़ी हो गई मेरी बच्ची ।’ कहते हुए भाभो ने मुझे चिपका लिया ।

‘तुम भी तो बूढ़ी हो गई हो भाभो ।’ कहकर मैंने भाभो को हंसाना चाहा पर वह नहीं हंसी , बस मुझे देखती रही । फिर मेरे कान के पास आकर हौले से बोली – ‘बच्चे भी है तेरे ?’

मैंने मुस्कराकर हां में गर्दन हिलाई । और घर चलने के लिए कहा ।

भाभो के लाख मना करने पर भी में उसे अपने घर ले आई । मेरे बच्चे , परिवार देख वह बहुत खुश हुई । तीस बरस पहले की भाभो मेरी आंखों के सामने आ । खड़ी हुई । गूगी गुड़िया सी । मुझे तो बस भाभो से एक ही सवाल का जवाब चाहिए था , जिसका मुझे बरसा । से इंतजार था ।

‘भाभो ! ऐ भाभो ! तू ठंडी रोटियां क्यों खाती है , रोटियों पर घी क्यों नहीं लगाती । सबके खा लेने के बाद अकेली बैठी क्यों खाती है ?’ सवाल पर सवाल करती मैं , तब भाभो मुझे दूसरी बातों में इस कदर उलझा देती कि में अपने सवालों के जवाब लेना ही भूल जाती । वह कभी गायों की , बछडों की , कभी खेतों की तो कभी कुएं में रहने वाले काले नाग की कहानियां सुनाकर मेरा ध्यान भटका देती । सब्जी नहीं बचने पर वह प्याज की परतें उतारती या खरल पर लाल मिर्च का मसाला बनाती । आंसुओं को बड़ी चतुराई से लगड़ी के पल्लु से पोछती । पर मुझसे नहीं छिपा पाती । वह मेरी दादी से जितना नहीं बचती , खाने के वक्त उतना मुझसे छिपती ।

भाभो मेरे बाबा की भाभी थी । मां और बाबा उसे भाभी कहते सो मेरे कानों ने भी यही सुना और में भी भाभी…भाभी ही करती लेकिन मेरा भाई तुतलाता हुआ भाभो – भाभो करता , जिसके चलते मैं भी इसी नाम से बोलती बतियाता । घर पर में , मेरा छोटा भाई , मां – बाबा , दादी , ताऊजी और भाभो हम सात लोग थे । दादी मझे बिल्कुल भी पसंद नहीं थी । दादी अक्सर भाभो पर किच – किच करती । कभी गाय – भैंसों को गालियां देतीं , तो कभी घर आए मंगतों को , फिर भाभो घूघट खींचकर रोती । कई बार मेरी कोई गलती नहीं भी होती तो भी दादी मझे अनाप – शनाप सुनातीं । मैं बुक्का फाड़कर रोने बैठ जाती तो मां कहती – ‘पगली रो मत दादी तुझे नहीं , तेरी आड़ में भाभी को सुना रही हैं ।’ बाद में समझ आया कि गाय – भैंसों और मंगतों को दी जाने वाली गालियां भी भाभो के नाम ही होती ।

मेरी मां नहातीं , तो बाल धोकर धूप में सुखाने बैठतीं । सरसों के तेल से खोपड़ी की पिलाई ही कर डालतीं । लाल रिबन से बड़ा सा फुग्गा बनातीं । दूसरी ओर भाभो को देखो , गीले बालों को कसकर बांध देती । न सुलझाती न ही तेल – कंघी करतीं । मुझे उस पर दया और क्रोध दोनों आते । आखिर क्यों करती है वह ऐसा । कपड़े तक वह मेरी मां की उतरन ही पहनती । मेरी दादी उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करती । पूछने पर न मां सही जवाब देती न ही भाभो बताती ।

एक दिन मैंने देखा कि भाभो का सामान बैलगाडी में भरा जा रहा था । ताऊजी ने बैल जोतकर रस्सी ग्वाले के हाथ थमा दी । मैं कछ समझ पाती उससे पहले ही बैलगाड़ी चल दी । मैं चीख पड़ी – ‘मां , भाभो कहां है और यह रेवत उसका सामान कहां लिए जा रहा है ?’

मां ने बताया – ‘तेरी भाभो मायके जा रही है ।’

‘पर मां ग्वाला यह सामान क्यों ले जा रहा है ?’

‘वो इसलिए कि तेरी चहेती अब मेरे घर में कदम नहीं रखेगी ।’ दादी ने दांत दिखाते हुए कहा ।

‘ क्या बिगाड़ा उसने आपका ? क्यों तंग करते हो उसे ‘ , कहती हुई मैं रो पड़ी ।

‘ताऊजी…ताऊजी…आपने क्यों जाने दिया भाभो को ।’ मैं मिन्नतें करती रही , पर ताऊजी की तो मानो जबान ही अलोप हो गई ।

चली गई भाभो , मुझे उसकी बहुत याद आती महीने बीते साल गुजरे और होले – हौले भाभी की यादें बहुत पीछे छूट गई । एक बार चोरी छिपे में और बाबा भाभी के पीहर भी गए पर पता चला कि वह तो उनके घर आई ही नहीं । सच क्या था यह तो राम ही जाने या मेरी गऊ सी भोली भाभो ही जाने । मैं अपने घर – परिवार व्यस्त हो चली । पर अक्सर यह सवाल मेरे मन को हिला देता कि आखिर क्या गुनाह था भाभी का कि उसे घर से ही निकाल दिया ।

बच्चे और भाभो सो चुके थे । मुझे इस रात बीत जाने का इंतजार था । सवेरे – सवेरे चाय का कप हाथ में थमाते हुए मैंने सवाल किया – ‘भाभी आखिर क्या वजह थी कि दादी तुम पर जुल्म करती और तुम चुपचाप सहती रहीं । गूंगी बनकर घर तक छोड़ दिया क्यों निकाला गया तम्हें घर से ?’

क्या हो जाएगा अब इन सब जख्मों को कुरेदने । जिंदगी तो ज्यों – त्यों कट ही गई ।

‘क्यों बताओगी मुझे और वैसे भी मैं होती ही कौन हूं ?’ तुम्हारी बेटी होती तो तुम अपनी तकलीफ कहती मन नाराज होने का नाटक भर किया तो वह इस कदर पिघली कि पूरी कहानी कहकर ही रुकी ।

‘एक रोज खेत से आते वक्त मवेशी पड़ोसी खेत में जा घुसे । मैं निकालने पीछे को दौड़ी पर गीले गारे में पांव धंस गए । अंधेरा होने को आया कैसे निकालूं सभी को बाहर । तभी खेत मालिक गुर्शता हुआ आया और…। मेरे पीछे दौड़ा । गीले खेत से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था । पांव धंसते गए और गिर पड़ी । उसने मुझे घसीटकर खेत के बाहर किया और कोटेदार लकड़ी से मार – मारकर अधमरा कर दिया । मेरी हालत जिसने भी देखी , यही कहा कि जोर जबरदस्ती गई बेचारी के साथ । पूरे गांव में बातें होने लगी मुझे लेकर । मुझे अपवित्र माना जाने लगा । घर में सब मुझे अपराधी की भांति देखते । तेरी दादी तो मेरे हाथ का खाना – पानी तक नहीं लेती । कुछ दिनों तो मुझे पिछले कमरे में अलग कर दिया । खाना पीना मेरा अलग होता । तेरे ताऊ ने साफ – साफ़ कह दिया कि घर भले ही रह पर हमारे बीच पति – पत्नी का रिश्ता नहीं । एक रोज मुझे घर से निकाल ही दिया । भोजाइयों सामने रही नौकरानी बनकर , लेकिन जब हाथ – पांव थक गए तो भाई छोड़ गया वृद्धाश्रम ।’ कहते – कहके भाभो फफक पड़ी ।

‘लेकिन भाभो कसूरवार तो तुम भी रही हो । आखिर क्यों सहा तुमने अत्याचार ? क्यों काठ की गडिया बनकर तमने अपनी जिंदगी नर्क बना दी और कुछ नहीं बोल पाई मैं आगे ।’ अब इस उम्र में क्या नसीहत देती मैं उसे ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *