Badnaseeb Hindi Story

Badnaseeb बदनसीब – Hindi Story

[ सायरन बजाती हुई 108 एम्बुलेंस जितनी तेज़ी से मुख्य दरवाजे के अंदर घुसी, उतनी ही तेज़ गति से आपातकालीन विभाग के सामने ब्रेक लगाकर रुकी। उस समय में मरीज देख रहा था, पट एम्बुलेंस के टायर धिसने की आवाज से मेरा ध्यान दरवाजे से बाहर गया। हमारा वॉर्ड बॉय फटाफट स्ट्रेचर लेकर एम्बुलेंस के दरवाजे पर पहुंचा। ]

बदनसीब

– डाॅ. चमन टी माहेश्वरी

म एम्बुलेंस को देखकर कई बार अनुमान लगाते हैं कि अंदर कौन-सा मरीज होगा और अंदाजे लगभग सही ही होते हैं। जैसे कि यदि परुष आगे शांति से बेठा हे तो यह प्रसूति का केस होगा। कोई न हो और पीछे दरवाजे खोलते ही फटाफट रिश्तेदार या मेडिकल अटेडेंट उतरें तो यह एक्सिडेंट केस होगा। यदि कोई जल्दबाजी नहीं मतलब लावारिस मरीज होगा जो हमारे लिए बहुत जवाबदारी वाला केस होता है।

पर यहां में कोई अनुमान नहीं लगा पाया, क्योंकि न तो कोई आगे बैठा था, न तो कोई पुरुष जल्दबाजी में उतरा। पर हां एम्बुलेंस का सहायक कपड़े में समेटे हाथ में मरीज लेकर जल्दी से उतरा। यह एक असामान्य घटना थी, ऐसा बहुत ही कम होता है।

‘क्या हुआ वसंत? 108 एम्बुलेंस का सहायक वसंत जो लगभग चार-पांच मरीज रोज हॉस्पिटल लाता था, मैंने उससे पूछा।

‘सर यह नवजात बच्ची है, जिसे कोई झाड़ियों के पीछे छोड़ गया था। रोने की आवाज सुनकर किसी राहगीर ने 108 एम्बुलेंस को फोन किया।’ वसंत ने पूरी बात बताई।

हमने तुरंत ही बच्चे को बेबी वॉर्मर बेड में रखा। यह 108 सेवा की बड़ी सफलता है जिससे मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचने और मरीज की जान बचने की संभावना बढ़ जाती है। बच्ची का शरीर मैले-कचैले कपड़ों से ढका था जो स्त्री वस्त्र थे। शरीर पर झाड़ियों के कांटे चभे हए थे। मैंने और नर्सिंग स्टाफ ने बच्ची के शरीर से कांटे दूर किए और शरीर साफ़ किया। बच्ची कुछ ही घंटों पहले जन्मी थी। मैंने उसे कुछ जन्म के समय दिए जाने वाले जरूरी इंजेक्शन लगाए। बाकी बच्ची तंदुरुस्त लग रही थी। वह दर्द और भूख से रो रोकर सो गई थी, ऐसा उसके चेहरे से लग रहा था। उसके ढके कपड़ों से लगा कि उसकी जन्मदायी माता गरीब थी। शायद किसी मजबूरी में उसे छोड़ा होगा।

मैंने बच्ची की प्राथमिक चिकित्सा के बाद अस्पताल के मेडिको-लीगल रजिस्टर में केस दर्ज किया और पुलिस को सूचित किया। पुलिस के आने तक अस्पताल का पूरा स्टाफ चाहे वो वॉर्ड बॉय हो या फिर डॉक्टर बच्ची को प्यार से खिला रहे थे और सेल्फी ले रहे थे।

‘बच्ची सच में बहुत ही प्यारी है’ हैड नर्स ने कहा। ‘पर कितनी बदनसीब है। माता-पिता ने जन्मते हीत्याग दिया’ लैब टेक्नीशियन पल्लवी ने कहा।

‘मैं एक दिन ट्रेनिंग में अहमदाबाद क्या गई, मेरे बच्चे का रो रोकर बुरा हाल हो गया था’ सीनियर इंचार्ज मकवाणा बोली।

‘सही बात है, बिना माता-पिता के बच्चे की क्या जिंदगी ?’ सभी इस बच्ची के लिए दुख व्यक्त कर रहे थे। अब तक पुलिस कार्यवाही पूरी हो चुकी थी। बावला स्वास्थ्य केन्द्र में शिश नर्सरी न होने के कारण जनरल हॉस्पिटल में भेजना था। कुछ घंटों के प्यार ने उस बच्ची को अपना बना दिया। सब ग़मगीन हो गए। कुछ स्टाफ तो शिफ्ट ड्यूटी पूरी होने के बाद भी रुका हुआ था। पर जो है, वो तो है। बच्ची को एक नर्स और वॉर्डबॉय के साथ एम्बुलेंस में हॉस्पिटल भेजा गया। हमारे यहां कुछ दिन उसकी चर्चा चली। स्थानीय न्यूजपेपर में भी बच्ची की तस्वीर के साथ चर्चा थी। पुलिस ने उसकी जन्मदात्री मां व पिता को खोजने की कोशिश की और वो कोशिश अपेक्षानुसार नाकामयाब ही होनी थी। ‘साहब एक अच्छी बात बताऊं कुछ दिन बाद वॉर्डबॉय जो बच्ची को छोड़ने गया था, खुश होते हए बोला। उस बच्ची की बातें सुनकर पास के कक्ष में काम कर रही स्टाफ नर्स व इंचार्ज सिस्टर भी आ गई।

‘क्या ?’ मैंने पूछा।

‘साहब, उस बच्ची को किसी ने गोद लिया है। मुंबई से कोई हाईकोर्ट जज साहब आए थे। उनके कोई बच्चा नहीं था। वो हवाई जहाज से आए और गोद लेने की सारी सरकारी रस्में पूरी कर हवाई जहाज से ही वापस अपने साथ उस अनाथ बच्ची को ले गए।’

‘नसीब देखो साहब, झाड़ियों में फेंकी हुई बदनसीब बच्ची, अब बंगले में पलेगी और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बहुत महंगे स्कूलों में पढ़ेगी’ वॉर्डबॉय ने आश्चर्य व खुशी से कहा।

‘और बड़ी अफसर भी बनेगी’ नर्स ने कहा।

‘यह नसीब उसे अपने जन्म देने वाले माता-पिता के यहां कभी नहीं मिलता’ इंचार्ज सिस्टर मकवाणा ने कहा।

‘भले ही वो चांदी के चम्मच के साथ न पैदा हुई पर वो खाएगी तो सोने के चम्मच के साथ ही’ मैंने राहत की गहरी सांस लेते हुए आगे कहा, ‘सिस्टर यह वो बच्चे होते हजो अनअपेक्षित जगह जन्म तो ले लेते हैं पर उनको वहां पलना होता है जहां बच्चे को पालने की सर्वाधिक लालसा होती है। सर्वाधिक सुविधाएं होती हैं।’

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